
सोम रस जो कि वेद का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग कह सकते है के वारे में जव जानने की इच्छा हुयी और कोशिश की तो बहुत आश्चर्य हुआ ।सोम के बारे में किसी के भी द्वारा उपलव्ध कराये गये तथ्य सर्वस्वीकृत नही है ।
वेद में सोम रस अधिकांशता देवों कॆ पेय के रूप मे वर्णित है । लेकिन हिन्दी में भावार्थित सोम रस संसकृत मंत्रो मे मूलतः मात्र सोम ही लिखित है ।
श्रंगार रस , वीर रस , वीभत्स रस हास्य रस आदि रस मनुस्यो के मुख से उत्पन्न होते है एवं मनुष्यो के कानो द्वारा पिये जाते है और इनके पभाव भी अवश्य ही होते है वैसे ही वेद मे एक रस है जो देव पीते है उसे सोम रस कहा जाता है।
सोम रस वनानें की विधि पत्थर का खल और पत्थर का ही मूसल लीजियै मूसल को खल मे तल से ऊपर लटकता हुआ पहली दो अगुलियों एवं अंगूठे से मूसल का ऊपरी अंन्तिम सिरा पकड़े ,अब इस मूसल को मूसल के ऊपरी अन्तिम हिस्से को केन्द्र मे रखते हुये नीचे के हिस्से को इस प्रकार वृत्र गति दे कि मूसल खल के अन्दरूनी हिस्से मे लगातार स्वासतिक कृम से गतिमान हो , तव इसमे से जो ध्वनि उत्पन्न होती है यही सोम रस होता है ।
सोमानां स्वरणं कृणुहि ब्रहृणस्पते ।
कक्षीवन्तं य औशिजः ।।
उत स्म ते वनस्पते वातो वि वात्यग्रमित ।
अथो इन्द्राय पावते सुनु सोममुलुखलम ।।
ऋग्वेद भाग एक , सूक्ति संख्या 28 मंत्र संख्या 6
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